जैसे ही मैं ने रिसर्च ज्वायन की, मेरी सीनियर्स ने बुला कर एक वार्निंग दे दी कि सावदान रहना. इस डिपार्टमेंट की स्पेशियालिटी है कि जो भी स्त्रियां रिसर्च के लिये आती हैं वे काफी एक्सपीरियंस लेकर ही जाती हैं.
मेरे साथ एक डिफिकल्टी यह थी कि एमए में मेरा सब्जेक्ट हिन्दी नहीं था. सोशियोलजी से एमए किया. यहां लेकिन सिर्फ हिन्दी में ही रिसर्च कि फसिलिटी थी. पिताजी की जिद थी कि मैं पीएचडी जरूर करु. ट्रांसफर होकर इस शहर में आये थे. सब नया था. लेकिन सुना था कि हिन्दी के हेडआफ डिपर्टमेंट बडे कंपाशनेट हैं.
पिताजी ने उनसे मुलाकात की. अगले दिन मुझे बुलाया एवं देखते ही हिन्दी में रिसर्च ज्वायन करने का आर्ड दे दिया. अगले दिन ज्वायन कर लिया.
लेकिन पहला एक्सपीरियेंस अच्छा नहीं लगा जब सीनियरस ने वार्निंग दी.
